Tuesday, 2 April 2013


क्या न लिखूँ

 

 

दोपहर घर में बैठा मैं, कुछ,

सोच रहा,मस्तिस्क में आ रहे,

विषय कई,पर उलझन है की,

क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।

 

शब्दों और वाणी में, आज,

अनुशासन है नहीं, फिर भी,

समय देशकाल को विचारकर,

क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।

 

लिखने से तूफ़ान आ जाता,

लिखने से संबंध बिगड़ते,और,

सत्ता गिर जाती है ,इसीलिये,

क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।

 

लिखने से मन के भाव आते,

कटु सत्य निकल जाता है,

आ जाता भूचाल इससे,अतः,

क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।

 

पढ़ा जाता है,जो लिखा होता है,

सत्य है,जो लिख दिया जाता है,

लिखने पढ़ने को ध्यान रखकर,

क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।

 

आडवाणी ने कुछ लिखा था,

जिन्ना की मज़ार पर,अलग-थलग,

पड़ गए,न होता ऐसा यदि सोच लेते,

क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।
 

 

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