क्या न लिखूँ
दोपहर घर में बैठा मैं,
कुछ,
सोच रहा,मस्तिस्क में आ रहे,
विषय कई,पर उलझन है की,
क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।
शब्दों और वाणी में, आज,
अनुशासन है नहीं,
फिर भी,
समय देशकाल को विचारकर,
क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।
लिखने से तूफ़ान आ जाता,
लिखने से संबंध बिगड़ते,और,
सत्ता गिर जाती है ,इसीलिये,
क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।
लिखने से मन के भाव आते,
कटु सत्य निकल जाता है,
आ जाता भूचाल इससे,अतः,
क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।
पढ़ा जाता है,जो लिखा होता है,
सत्य है,जो लिख दिया जाता है,
लिखने पढ़ने को ध्यान रखकर,
क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।
आडवाणी ने कुछ लिखा था,
जिन्ना की मज़ार पर,अलग-थलग,
पड़ गए,न होता ऐसा यदि सोच लेते,
क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ ।
No comments:
Post a Comment