Friday, 26 April 2013

सरकारी नौकरी


सरकारी नौकरी

 

 

काश दो दिन दफ़्तर लगता ,

होती छुट्टी पाँच दिन,

खाते खेलते,सोते घर में

मौज मनाते पाँच दिन ।

 

बच्चे रोते भाग्य पर,

पर पत्नी खुश हो जाती,

हाथ बटाएगा काम में,

यह सोच मंद मुस्कुराती।

 

आ जाती तनख्वाह एक को,

बन जाता काम महीने का,

तान रज़ाई ,लेता खर्राटा,

जय बोलता सरकार की ।

 

जाता दफ़्तर सोम- मंगल,

बाँकी दिन अपने हो जाते,

तेल मालिश करता घर पर,

वोट देता सरकार को ।

 

समय काटता दिन भर घर पर,

ऑफिस का काम भी कर देता ,

त्याग दिखाता जीवन में मैं,

मुफ्त की तनख्वाह न खाता ।

 

कब आएगा समय ऐसा,

इसी का इंतजार है,

आ जाए अगर मुद्दा चुनाव में,

2014 अमर हो जाता ।

 

 

 

 

स्वस्थ होगा मानव तभी,

भरपूर नीद जब सोयेगा,

काम के बोझ से मुक्त होकर,

खुशहाल जीवन, जब जिएगा ।

 

बाबा ऐसे ही करते थे,

दो महीने में दफ़्तर जाते थे,

लेकर आते जब मोटी तनख्वाह,

नौकरी की बात तब हम जाने थे ।

 

आजादी बाद हुआ था ऐसा,

मजा किए थे लोग सब,

हुई कड़ाई नब्बे के बाद ,

मस्ती में पड़ी खड़ास रे ।

 

प्रतिभाशाली लोग आ गए,

मेहनत ये करते बहुत,

विध्न बने है,हमारे सुख के,

भाग्य हुआ विपरीत रे ।

 

राज्यों में होता है ऐसे,

जाते दफ़्तर एक दिन,

टूर बनाकर घूमा करते,

मजा मारते तीस दिन ।

 

हुई कड़ाई वहाँ भी अब,पर,

जाकर दफ़्तर में सोते हैं,

रौब दिखाते पत्नी पर,

कि कर आया मैं काम रे ।

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