Wednesday, 10 April 2013


जन सेवा

 

 

देख  गरीबी  भारत की,

फफक फफक मैं रो पड़ा,

क्यों अभिमान करूँ अपने पर,

अपने से ही , पूंछ पड़ा ।

 

शर्म नहीं आती क्यों उसको,

बड़ा आदमी कहता जो खुद को,

कोई बड़ा नहीं इस जग में,

परहित नहीं हैं,यदि कर्म में ।

 

लग जाओ, देश सेवा में,

उठो अभी,मत करो देरी,

खिल जाएगा जीवन नभ पर,

पूज्यनीय बन जाओगे ।

 

कष्टों  को अंगीकार करो,

अपने को तुम मजबूत करो,

केवल एक प्रभू की सत्ता,

ऐसा समझ,तुम काम करो ।

 

जन सेवा ही प्रभु सेवा है,

रहे ध्यान  इसका  सदा,

जुट जाओ,डट जाओ इसमें,

अमरत्व की प्राप्ति करो ।

 

अपने सपने को भी तुम,

मेहनत कर साकार करो,

कुछ कर लेने के बाद ही,

जनसेवा पर काम करो ।

 

 

 

कोई नहीं पूंछता उसको,

है पद ज्ञान से हीन जो,

पहले बनो खुद मजबूत,

फिर सबकी सेवा करो ।

 

रखो नियंत्रण लालच पर,

जरूरत का ही ध्यान करो,

करके मन और तन प्रसन्न,

जग का तुम कल्याण करो ।

 

हैं अमर पूर्वज तुम्हारे,

रहे ध्यान इस बात का,

जन सेवा के द्वारा तुम भी,

अमरत्व को प्राप्ति करो ।

 


 


 

 

 

 

 

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